﻿भजन-संहिता.
63.
दाऊद के एक भजन। जब ओह यहूदा के निरजन जगह म रिहिस। हे परमेसर, तेंह मोर परमेसर अस, उत्सुक होके मेंह तोला खोजथंव; सूखा अऊ झुलसत भुइयां म जिहां पानी नइं ए, मेंह तोर पीयासा हंव, मोर पूरा सरीर तोर संगति के कामना करथे। 
मेंह पबितर-स्थान म तोला देखे हवंव अऊ तोर सामर्थ अऊ तोर महिमा ला निहारेंव। 
काबरकि तोर मया ह जिनगी ले जादा बने अय, मोर मुहूं ह तोर महिमा करही। 
जब तक मेंह जीयत हंव, मेंह तोर परसंसा करहूं, अऊ तोर नांव के महिमा म मेंह अपन हांथ उठाहूं। 
मानो बने जेवन ले मेंह पूरा संतुस्ट होहूं, अऊ मेंह मोर मुहूं ले गावत तोर परसंसा करहूं। 
अपन दसना म मेंह तोला सुरता करथंव; रथिया के बेरा मेंह तोर बारे म सोचथंव। 
काबरकि तेंह मोर मददगार अस, मेंह तोर डेना के छइहां म गाथंव। 
मेंह तोर संग लगे रहिथंव; तोर जेवनी हांथ ह मोला संभालथे। 
जऊन मन मोला मार डारे चाहथें, ओमन नास हो जाहीं; ओमन धरती के गहरई म दब जाहीं। 
ओमन तलवार ले मारे जाहीं अऊ सियारमन के जेवन बन जाहीं। 
पर राजा ह परमेसर म आनंद मनाही; ओ जम्मो जऊन मन परमेसर के सपथ खाथें, ओमन ओकर महिमा करहीं, जबकि लबरामन के मुहूं ला बंद करे जाही। 
