﻿अयूब.
25.
तब सूही के रहइया बिलदद ह जबाब दीस: 
“परभूता अऊ भय के अधिकारी परमेसर ही अय; ओह ऊंच स्वरग म सांति स्थापित करथे। 
का ओकर सेनामन के गनती करे जा सकथे? अइसे कोन हवय, जेकर ऊपर ओकर अंजोर नइं परय? 
तब एक मरनहार मनखे ह परमेसर के आघू म कइसे धरमी हो सकथे? माईलोगन ले जनमे मनखे ह कइसे सुध हो सकथे? 
कहूं ओकर नजर म चंदा ह घलो उजला अऊ तारामन घलो ओकर नजर म सुध नइं अंय, 
त फेर मरनहार मनखे के का गनती, जऊन ह सिरिप एक गेंगरूआ अय— एक मनखे, जऊन ह सिरिप एक कीरा अय!” 
